इस इश्क की कोई तरकीब ना थी

तुम क्या जानो
उस मौसम का मिज़ाज
जिसके कम्बल में
एक गरम दिल था

तुम क्या जानो
उस दिल का हाल
जो भटके भी
तो मंज़िल था

क्या जानो उस
नरम दिल की ताल
जिसका अकेले भी
सब महफ़िल था

अरे, तुम क्या जानो
उस इश्क का हाल
जो सब खो के ही
हमको हासिल था